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उम्मीद की सीढ़ी
रमेश एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। उसका परिवार बहुत गरीब था। पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में बर्तन माँजती थीं। रमेश पढ़ना चाहता था, लेकिन हालात हर दिन उसे पढ़ाई से दूर ले जाने की कोशिश करते थे। कई बार स्कूल की फीस न होने के कारण उसे कक्षा से बाहर बैठना पड़ता था। गाँव के लोग अक्सर कहते, “गरीबी में पैदा हुआ है, ज्यादा सपने मत देख।” ये बातें रमेश के दिल को चुभती थीं, लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं था। वह जानता था कि अगर उसे अपनी ज़िंदगी बदलनी है,
Suraj Sondhiya
4 days ago2 min read
खामोश घंटी
छोटे से कस्बे में एक पुराना स्कूल था। उसकी दीवारों पर समय की परतें जमी थीं और आँगन में लगा पीपल का पेड़ हर सुबह बच्चों की हँसी सुनता था। उसी स्कूल में पढ़ता था आरव—शांत, कम बोलने वाला, लेकिन आँखों में ढेर सारे सवाल लिए। आरव के पिता स्टेशन पर कुली थे। माँ सिलाई करके घर चलाती थीं। घर में किताबें कम थीं, पर सपने बहुत। आरव रोज़ स्कूल के बाद लाइब्रेरी जाता और पुराने अख़बारों व किताबों में डूब जाता। उसे सबसे ज़्यादा विज्ञान पसंद था—क्योंकि वहाँ “क्यों” पूछने की आज़ादी थी। एक दिन स्
Suraj Sondhiya
Dec 27, 20252 min read
आख़िरी दीया
रात का समय था। पूरा गाँव अँधेरे में डूबा हुआ था। बिजली कई दिनों से नहीं आई थी। केवल रामू के घर के बाहर एक छोटा-सा दीया जल रहा था। वही दीया पूरे गाँव के लिए उम्मीद की तरह चमक रहा था। रामू गाँव का साधारण किसान था। मेहनत उसकी आदत थी, लेकिन किस्मत हमेशा उसका साथ नहीं देती थी। कभी सूखा पड़ता, कभी फसल खराब हो जाती। लोग कहते, “रामू, अब खेती छोड़ दे, कुछ और कर ले।” लेकिन रामू जानता था कि अगर वह हार मान लेगा, तो उसके बच्चों का भविष्य भी अँधेरे में चला जाएगा। एक दिन गाँव में एक अफ़सर न
Suraj Sondhiya
Dec 22, 20252 min read
समय की कीमत
अजय एक छोटे से कस्बे में रहने वाला सामान्य युवक था। उसके पिता सरकारी कर्मचारी थे और माँ गृहिणी। घर में कोई कमी नहीं थी, लेकिन अजय के भीतर एक बेचैनी थी—वह जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता था। वह मानता था कि अभी बहुत समय है, सपने बाद में भी पूरे किए जा सकते हैं। कॉलेज खत्म होने के बाद अजय ने तैयारी शुरू करने के बजाय टालना शुरू कर दिया। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों—यही उसका मंत्र बन गया। दोस्त आगे बढ़ते गए, कोई नौकरी में लग गया, कोई अपने काम में व्यस्त हो गया, लेकिन अजय वहीं खड़ा
Suraj Sondhiya
Dec 21, 20252 min read
हार मानने से एक कदम पहले
रवि एक साधारण गाँव से आया हुआ लड़का था। पिता खेतों में मेहनत करते थे और माँ घरों में सिलाई। सपने बड़े थे, लेकिन हालात छोटे। रवि का सपना था कि वह एक दिन अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालेगा और समाज में अपनी पहचान बनाएगा। रवि जब शहर आया तो उसे लगा कि मेहनत से सब कुछ मिल जाएगा। शुरुआत में उसने एक छोटी नौकरी पकड़ी। सुबह जल्दी निकलना, देर रात लौटना—यह उसकी दिनचर्या बन गई। लेकिन कुछ ही महीनों में उसे अहसास हुआ कि सिर्फ मेहनत काफी नहीं होती, धैर्य और सही दिशा भी जरूरी होती है। नौकर
Suraj Sondhiya
Dec 20, 20252 min read
समय की रसीद
रेलवे स्टेशन के बाहर एक पुरानी सी चाय की दुकान थी। नाम था “विश्वास टी स्टॉल”। दुकान छोटी थी, पर वहाँ रुकने वालों की कहानियाँ बड़ी थीं। उस दुकान को चलाता था रमेश, जो हर ग्राहक को चाय के साथ मुस्कान भी मुफ्त देता था। रमेश की एक आदत सबको अजीब लगती थी। वह हर दिन एक रजिस्टर में कुछ लिखता और आखिर में नीचे तारीख डालकर हस्ताक्षर करता। किसी ने पूछा तो बस हँसकर कहता, “यह मेरी ज़िंदगी की रसीद है।” एक दिन देर रात स्टेशन पर अफरा-तफरी मच गई। एक बूढ़ा आदमी प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ा। लोग घबराए,
Suraj Sondhiya
Dec 19, 20251 min read
चुपचाप दिया गया कर्ज़
गाँव बैरागढ़ छोटा था, पर वहाँ के लोग दिल के बड़े थे। उसी गाँव में रहता था मोहन, जो कस्बे के सरकारी स्कूल में चपरासी था। तनख़्वाह कम थी, पर इज़्ज़त बहुत। हर सुबह मोहन स्कूल के गेट पर झाड़ू लगाता, बच्चों को मुस्कुराकर अंदर जाने देता और सबसे पहले तिरंगे को सलाम करता। बच्चे उसे “मोहन काका” कहते थे। एक दिन स्कूल में खबर फैली कि प्रधानाध्यापक की बेटी की पढ़ाई रुक सकती है। शहर के कॉलेज की फीस बहुत ज़्यादा थी। बात धीरे-धीरे मोहन के कानों तक पहुँची। उस रात मोहन देर तक जागता रहा। उसकी
Suraj Sondhiya
Dec 17, 20251 min read
“एक दिन की वर्दी”
शहर के पुराने हिस्से में रहने वाला रोहन हर सुबह एक ही नज़ारा देखता था—गली के मोड़ पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का जवान, सीटी बजाता हुआ, धूप-बारिश की परवाह किए बिना अपनी ड्यूटी करता। रोहन अक्सर सोचता, “लोग बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठकर देश की सेवा करते हैं, पर असली मेहनत तो यही लोग करते हैं।” रोहन एक साधारण क्लर्क था। न वर्दी, न तमगे, न किसी पर आदेश चलाने का अधिकार। लेकिन उसके भीतर एक इच्छा थी—कम से कम एक दिन ऐसा हो, जब वह भी किसी के लिए जिम्मेदार बने। एक दिन ऑफिस जाते समय सड़क पर बड़
Suraj Sondhiya
Dec 13, 20252 min read
“सीमा की आख़िरी लाइन”
हिमालय की ऊँची बर्फ़ीली चोटियों के बीच बसा छोटा सा गाँव मल्ला हर साल कड़कड़ाती सर्दियों से जूझता था। लेकिन वहाँ के लोगों का हौंसला मौसम से भी ज्यादा मज़बूत था। इसी गाँव में रहता था अंशुल, जिसकी आँखों में एक ही सपना पलता था—देश की वर्दी पहनना। अंशुल के पिता एक किसान थे, पर उन्होंने हमेशा बेटे में देशभक्ति की लौ जगाई। बचपन में वे अक्सर कहते, “बेटा, सरहदें बर्फ से नहीं, जवानों की हिम्मत से जमी रहती हैं।” यह बात अंशुल के दिल में पत्थर पर लिखी की तरह बस गई। समय के साथ अंशुल बड़ा ह
Suraj Sondhiya
Dec 11, 20252 min read
“तिरंगे की छाया में”
राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में बसे छोटे से कस्बे सरदारपुरा का हर बच्चा रेत के टीलों में खेलते-खेलते एक ही सपना देखता—फौजी बनना। उन्हीं बच्चों में से एक था वीर, जिसकी आँखों में बचपन से ही तिरंगे की चमक बसती थी। स्कूल में जब भी राष्ट्रगान बजता, वीर सबसे ऊँची आवाज़ में गाता। उसकी माँ हँसकर कहती, “एक दिन ये बच्चा पूरा गाँव रोशन करेगा।” समय बीतता गया और वीर का सपना और मजबूत होता गया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने सेना की भर्ती दी, पर पहली बार में चयन नहीं हुआ। आस-पास के लोग बोलते,
Suraj Sondhiya
Dec 10, 20252 min read
आख़िरी पहरेदार
पहाड़ों के बीच बसा छोटा-सा गाँव देवगांव अपने शांत वातावरण और सादगी के लिए जाना जाता था। उसी गाँव में रहता था अरुण, जो बचपन से ही अपने दादा से आज़ादी की कहानियाँ सुनकर बड़ा हुआ था। अरुण के दादा स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे थे, और हर कहानी के अंत में कहा करते, “बेटा, देश सिर्फ मिट्टी नहीं होता, ये हमारी सांसों की जिम्मेदारी है।” यही बात अरुण के दिल में घर कर गई थी। अरुण पढ़ाई में होशियार था, पर उसके मन में सिर्फ एक सपना था—भारतीय सेना में जाना। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, वह अपने स
Suraj Sondhiya
Dec 9, 20252 min read
“कभी-कभी खामोशी नहीं, हिम्मत जरूरी होती है”
जीवन में अक्सर हमें ये सिखाया जाता है कि शांति सबसे बड़ी ताकत है। गुस्सा खराब है, बहस मत करो, चुप रहो—यही बातें बचपन से हमारे कानों में डाली जाती हैं। लेकिन हर परिस्थिति में चुप रहना सच में सही होता है क्या? यही सवाल हमारी कहानी का असली संदेश है। यह कहानी है अरविंद की, जो एक शांत स्वभाव का, मेहनती और ईमानदार लड़का था। ऑफिस हो या घर, वह हमेशा झगड़े से दूर रहता था। अगर कोई उसकी मेहनत का श्रेय ले जाए, तब भी वह मुस्कुरा कर चुप हो जाता। अगर कोई उसका हक छीन ले, फिर भी वह “कोई बात न
Suraj Sondhiya
Nov 26, 20252 min read
“टूटा हुआ दीपक”
एक शांत गाँव में अनिरुद्ध नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन हर बार असफल होने पर खुद को ही दोष देता था। उसे लगता था कि वह किसी काम के लायक नहीं है। दीवाली से एक दिन पहले गाँव के मंदिर में पूजा की तैयारी हो रही थी। पुराना मुख्य दीपक टूट गया था और पुजारी नए दीपक की तलाश कर रहे थे। मगर मंदिर में पड़े बाकी दीपक भी या तो टेढ़े थे, या थोड़ा सा टूटे हुए। अनिरुद्ध ने पुजारी से कहा— “बाबा, ये सब दीपक खराब हैं… इनसे क्या उजाला होगा?” पुजारी मुस्कुराए और बोले— “बेटा, उजाल
Suraj Sondhiya
Nov 25, 20251 min read
“किस्मत का दरवाज़ा”
एक पुराने कस्बे में राघव नाम का एक युवक रहता था। वह मेहनती था, ईमानदार था, लेकिन उसकी एक आदत उसे पीछे खींचती थी— वह हर काम शुरू करने से पहले ही डर जाता था। एक दिन वह अपने पिता के साथ खेत में काम कर रहा था। दूर पहाड़ की चोटी पर एक पुरानी सी हवेली दिख रही थी। पिता ने कहा— “राघव, उस हवेली में एक ऐसा खजाना है जो किसी की किस्मत बदल सकता है।” राघव की आँखें चमक गईं। “तो कोई ले क्यों नहीं जाता, पिताजी?” पिता मुस्कुराए— “क्योंकि… उसके दरवाज़े पर दो शेरों की मूर्तियाँ हैं। लोग डरकर लौट
Suraj Sondhiya
Nov 24, 20251 min read
“उस एक कदम ने सब बदल दिया”
एक छोटे कस्बे में अर्जुन नाम का युवक रहता था। उसके सपने बड़े थे, लेकिन हालात छोटे। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और लोग हमेशा उसे यही कहते थे— “तेरे बस का कुछ नहीं, नौकरी कर ले… सपने मत देखा कर।” अर्जुन चुप रहता, लेकिन भीतर कहीं न कहीं एक आग जलती रहती। उसका सपना था अपना खुद का छोटा-सा बिज़नेस शुरू करना। पर उसके पास न पैसा था, न अनुभव। एक दिन वह शहर गया, जहाँ उसने एक सफल व्यापारी को कहते सुना— “हारने वाला वो नहीं होता जो गिरता है… हारने वाला वो होता है जो उठने की सोचता ही नहीं।
Suraj Sondhiya
Nov 22, 20251 min read
“एक तीर, एक प्रतिज्ञा”
राजस्थान की वीर भूमि मेवाड़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। उनका जीवन वैभव, सत्ता और महलों से नहीं बल्कि स्वाभिमान, संघर्ष और आत्मसम्मान से परिभाषित हुआ। समय ऐसा आया जब पूरे भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार होता जा रहा था। कई राजघराने अपने वैभव, सिंहासन और सुरक्षा के लिए मुग़लों से समझौता कर चुके थे। सलाहकारों ने महाराणा प्रताप से भी कहा कि यदि वे भी समझौता कर लें तो महलों, धन और सुख की कोई कमी नहीं रहेगी। लेकिन महाराणा प्रताप ने शांत स्वर में उत्तर दिया — “जिस मिट्टी ने म
Suraj Sondhiya
Nov 20, 20251 min read
“वो मोमबत्ती जो बुझी नहीं”
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय की बात है। भारत अंग्रेज़ी हुकूमत की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था। विद्रोह की चिंगारी भले ही कुछ स्थानों पर दिख रही थी, लेकिन देश के अधिकांश लोग डर के कारण आवाज़ उठाने से कतराते थे। उसी समय झाँसी की धरती पर एक महिला योद्धा ने जन्म लिया — मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई)। बचपन से ही उनमें असाधारण साहस झलकता था। जब अन्य लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं, वह घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और युद्धकला सीखती थीं। समय के साथ उन्हें झाँसी की रानी घोषित किया गया, लेकिन
Suraj Sondhiya
Nov 16, 20252 min read
एक सच्चे देशभक्त की कहानी
भारत के एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक साधारण लड़का रहता था। उसका बचपन खेतों में खेलते, नदी में नहाते और स्कूल जाते हुए बीता। लेकिन एक चीज़ थी जो उसे दूसरों से अलग बनाती थी — उसका देश के प्रति प्रेम। जब गाँव में 15 अगस्त या 26 जनवरी का झंडा फहराने का दिन आता, तो अर्जुन सबसे पहले स्कूल पहुँच जाता था। झंडा फहराते समय उसकी आँखों में चमक होती, जैसे उस तिरंगे में ही उसका सपना बसता हो। एक दिन उसके शिक्षक ने पूछा, “अर्जुन, बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?” अर्जुन ने बिना एक पल गँ
Suraj Sondhiya
Nov 12, 20252 min read
“आखरी सलाम”
एक छोटे से कस्बे में विक्रम नाम का लड़का रहता था। बचपन से ही उसे तिरंगे से बहुत लगाव था। जब भी स्कूल में ध्वजारोहण होता, उसकी आंखों में एक अलग चमक दिखाई देती। उसका सपना था देश की वर्दी पहनना, सीमा पर खड़े होकर देश की रक्षा करना। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। लोग कहते थे — “नौकरी कहाँ मिलेगी? छोड़ दे ये फौज वाला सपना।” लेकिन विक्रम ने ठान लिया — “मुझे ये जीवन देश के नाम करना है, बस।” वो सुबह-सुबह दौड़ता, अभ्यास करता, मेहनत करता। आखिरकार उसका चयन सेना में हो गया। जिस दिन उसके घ
Suraj Sondhiya
Nov 11, 20251 min read
"Mangal Pandey: Ek Sipahi Jisne Azaadi Ki Chingari Jagayi"
Azaadi hum sab ke liye ek shabd nahi, ek ehsaas hai. Lekin is azaadi ko paane ke liye humare desh ke kai veer yoddhao ne apna sab kuch balidaan kar diya. Unhi me se ek naam hai Mangal Pandey. Unhone apni jaan ki parwah na karte hue, angrezon ki zulm ke khilaaf pehli chingari jalaayi. Ye sirf ek kahani nahi, ek aisa yatharth hai jo aaj bhi dil ko garv se bhar deta hai. Mangal Pandey ka janm 19 July 1827 ko Balia, Uttar Pradesh me ek saral Brahmin parivaar me hua. Bachpan se hi
Suraj Sondhiya
Nov 9, 20252 min read
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