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एक दिन, जब संविधान बोल उठा
सुबह की ठंडी हवा में तिरंगे की हल्की-हल्की सरसराहट थी। गाँव के स्कूल के मैदान में बच्चे कतारबद्ध खड़े थे। आज 26 जनवरी थी—गणतंत्र दिवस। हर साल की तरह इस साल भी ध्वजारोहण होना था, लेकिन इस बार कुछ अलग होने वाला था। आठवीं कक्षा का छात्र अमन सबसे पीछे खड़ा था। उसके मन में सवालों का सैलाब था— “आज़ादी तो 1947 में मिली थी, फिर 26 जनवरी इतना खास क्यों है?” ध्वजारोहण के बाद प्रधानाचार्य जी ने मंच से कहा, “आज हम सिर्फ झंडा नहीं फहरा रहे, आज हम अपने संविधान को याद कर रहे हैं।” अमन का मन
Suraj Sondhiya
Jan 222 min read
हार के बाद की शुरुआत
रमेश एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण युवक था। उसके सपने बड़े थे, लेकिन हालात बेहद सीमित। पिता किसान थे और आमदनी इतनी कम कि घर का खर्च मुश्किल से चलता। रमेश पढ़ाई में अच्छा था, फिर भी परिस्थितियों के कारण उसे कई बार अपनी पढ़ाई रोकनी पड़ी। हर बार जब वह आगे बढ़ने की कोशिश करता, कोई न कोई परेशानी सामने आ जाती। एक दिन रमेश ने शहर जाकर नौकरी ढूँढने का फैसला किया। उसने सोचा, “अगर यहाँ नहीं तो कहीं और सही, लेकिन अब रुकना नहीं है।” शहर पहुँचकर उसने कई दफ्तरों के चक्कर लगाए, लेकिन
Suraj Sondhiya
Jan 172 min read
उम्मीद की सीढ़ी
रमेश एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। उसका परिवार बहुत गरीब था। पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में बर्तन माँजती थीं। रमेश पढ़ना चाहता था, लेकिन हालात हर दिन उसे पढ़ाई से दूर ले जाने की कोशिश करते थे। कई बार स्कूल की फीस न होने के कारण उसे कक्षा से बाहर बैठना पड़ता था। गाँव के लोग अक्सर कहते, “गरीबी में पैदा हुआ है, ज्यादा सपने मत देख।” ये बातें रमेश के दिल को चुभती थीं, लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं था। वह जानता था कि अगर उसे अपनी ज़िंदगी बदलनी है,
Suraj Sondhiya
Jan 112 min read
खामोश घंटी
छोटे से कस्बे में एक पुराना स्कूल था। उसकी दीवारों पर समय की परतें जमी थीं और आँगन में लगा पीपल का पेड़ हर सुबह बच्चों की हँसी सुनता था। उसी स्कूल में पढ़ता था आरव—शांत, कम बोलने वाला, लेकिन आँखों में ढेर सारे सवाल लिए। आरव के पिता स्टेशन पर कुली थे। माँ सिलाई करके घर चलाती थीं। घर में किताबें कम थीं, पर सपने बहुत। आरव रोज़ स्कूल के बाद लाइब्रेरी जाता और पुराने अख़बारों व किताबों में डूब जाता। उसे सबसे ज़्यादा विज्ञान पसंद था—क्योंकि वहाँ “क्यों” पूछने की आज़ादी थी। एक दिन स्
Suraj Sondhiya
Dec 27, 20252 min read
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