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आख़िरी पहरेदार

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Dec 9, 2025
  • 2 min read

पहाड़ों के बीच बसा छोटा-सा गाँव देवगांव अपने शांत वातावरण और सादगी के लिए जाना जाता था। उसी गाँव में रहता था अरुण, जो बचपन से ही अपने दादा से आज़ादी की कहानियाँ सुनकर बड़ा हुआ था। अरुण के दादा स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे थे, और हर कहानी के अंत में कहा करते, “बेटा, देश सिर्फ मिट्टी नहीं होता, ये हमारी सांसों की जिम्मेदारी है।” यही बात अरुण के दिल में घर कर गई थी।


अरुण पढ़ाई में होशियार था, पर उसके मन में सिर्फ एक सपना था—भारतीय सेना में जाना। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, वह अपने सपने को और मजबूती से पकड़कर आगे बढ़ता रहा। अंततः एक दिन उसका चयन भारतीय सेना में हो गया। पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। दादा ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “अब तू हमारी मिट्टी का सच्चा कर्ज उतारेगा।


कुछ वर्षों बाद, अरुण एक बहादुर सैनिक बन चुका था। उसकी तैनाती दुर्गम पहाड़ी सीमा पर हुई, जहाँ तापमान शून्य से नीचे रहता था और दुश्मन का खतरा हमेशा मंडराता रहता था। पर अरुण के चेहरे पर कभी थकान नहीं दिखती थी; वह हमेशा मुस्कुराकर कहता, “सरहद पर खड़ा हूँ, तो देश चैन से सोता है।”


एक सर्द रात सीमा पर संदिग्ध हलचल देखी गई। कमांडर ने छोटी टुकड़ी को अलर्ट रहने का आदेश दिया। अरुण उस रात पहरे पर था। तेज़ हवा और धुंध इतनी थी कि हाथ सामने रखो तो दिखाई न दे। तभी उसे पहाड़ी की ओट से हलकी सी आवाज़ सुनाई दी। वह तुरंत चौकन्ना हुआ।


कुछ देर बाद उसे पता चला कि दुश्मन सैनिकों का एक छोटा समूह सीमा पार करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने ऐसे रास्ते चुने थे जहाँ निगरानी बहुत मुश्किल थी। अरुण ने बिना एक पल गंवाए वायरलेस पर संदेश भेजा, लेकिन सिग्नल कमज़ोर था। वह जानता था कि टुकड़ी को पहुँचने में देर होगी। यदि दुश्मन उस रास्ते से अंदर घुस गया, तो आगे बड़ा नुकसान हो सकता था।


अरुण ने अकेले ही दुश्मन को रोकने का फैसला किया। वह चुपचाप चट्टानों के बीच पोज़िशन लेकर बैठ गया। जैसे ही पहला दुश्मन आगे बढ़ा, अरुण ने फायर किया। अचानक हुई गोलीबारी से दुश्मन चौक गए। उन्हें लगा कि सीमा पर बड़ी टुकड़ी तैनात है। उन्होंने जवाबी गोलीबारी की, पर अरुण अपनी जगह डटे रहे।


कुछ ही मिनटों में बाकी भारतीय सैनिक भी पहुँच गए। दुश्मन पीछे हटने पर मजबूर हो गया। ऑपरेशन सफल रहा, लेकिन जब साथियों ने अरुण को देखा, वह घायल अवस्था में ज़मीन पर पड़ा था। उसके चेहरे पर दर्द की जगह संतोष था।


कमांडर ने उसके हाथ पर हाथ रखा तो अरुण मुस्कुराते हुए बोला, “सर, बस… देश सुरक्षित है ना?”

कमांडर की आँखें भर आईं। “हाँ बेटे, देश सुरक्षित है… क्योंकि तुम जैसे लोग अभी भी जिंदा हो, चाहे शरीर से या अपनी शहादत की कहानी से।”


अरुण ने अंतिम सांस लेते हुए आसमान की ओर देखा, मानो तिरंगे को सलाम कर रहा हो। अगले दिन गाँव में जब यह खबर पहुँची, दादा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “आज मेरा बेटा नहीं गया… आज देवगांव का एक और वीर अमर हो गया।”


और उस दिन से देवगांव के प्रवेश द्वार पर एक पट्टिका लगाई गई—

“यहाँ अरुण रहता था… जो देश की रक्षा करते हुए अमर हो गया।”

 
 
 

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