खामोश घंटी
- Suraj Sondhiya
- Dec 27, 2025
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छोटे से कस्बे में एक पुराना स्कूल था। उसकी दीवारों पर समय की परतें जमी थीं और आँगन में लगा पीपल का पेड़ हर सुबह बच्चों की हँसी सुनता था। उसी स्कूल में पढ़ता था आरव—शांत, कम बोलने वाला, लेकिन आँखों में ढेर सारे सवाल लिए।
आरव के पिता स्टेशन पर कुली थे। माँ सिलाई करके घर चलाती थीं। घर में किताबें कम थीं, पर सपने बहुत। आरव रोज़ स्कूल के बाद लाइब्रेरी जाता और पुराने अख़बारों व किताबों में डूब जाता। उसे सबसे ज़्यादा विज्ञान पसंद था—क्योंकि वहाँ “क्यों” पूछने की आज़ादी थी।
एक दिन स्कूल में घोषणा हुई—राज्य स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी। शिक्षक ने कहा, “जिसका प्रोजेक्ट चुना जाएगा, उसे शहर जाकर प्रदर्शनी में हिस्सा लेने का मौका मिलेगा।” क्लास में उत्साह फैल गया। आरव ने भी हाथ उठाया, पर कुछ बच्चों की हँसी सुनकर हाथ धीरे से नीचे कर लिया।
घर लौटकर उसने माँ से कहा, “मैं कुछ बनाना चाहता हूँ—ऐसा जो काम आए।” माँ मुस्कुराईं, “काम आने वाली चीज़ें दिल से बनती हैं, पैसों से नहीं।”
आरव ने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर सोचना शुरू किया। कस्बे में पानी की समस्या थी। उसने ठान लिया—कम खर्च का पानी साफ़ करने वाला फ़िल्टर। बोतलें, रेत, कोयला—जो मिला, उससे प्रयोग करता रहा। कई बार नाकाम हुआ, पर हर बार कुछ सीखा।
प्रदर्शनी के दिन जब उसने अपना प्रोजेक्ट पेश किया, तो उसकी आवाज़ काँप रही थी। लेकिन जैसे ही उसने समझाया कि कैसे यह फ़िल्टर कम पैसों में गंदा पानी साफ़ कर सकता है, कमरे में सन्नाटा छा गया। जजों ने सवाल पूछे—आरव ने धैर्य से जवाब दिए।
पर नतीजे में उसका नाम नहीं आया।
उस रात आरव चुपचाप पीपल के पेड़ के नीचे बैठा रहा। स्कूल की खामोश घंटी दूर से दिख रही थी। तभी स्कूल के प्रधानाचार्य आए। बोले, “जीतना सब कुछ नहीं होता, आरव। तुम्हारा विचार असली जीत है।” उन्होंने बताया कि एक सामाजिक संस्था उसके फ़िल्टर को गाँवों में आज़माना चाहती है।
कुछ महीनों बाद कस्बे के कई घरों में वही फ़िल्टर लगा था। लोग साफ़ पानी पी रहे थे। आरव जब स्कूल की घंटी सुनता, तो उसे लगता—यह सिर्फ़ छुट्टी की नहीं, शुरुआत की घंटी है।
और पीपल का पेड़? वह आज भी खड़ा है—हर उस बच्चे के सपनों का साक्षी, जो खामोशी में मेहनत करता है।
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