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“सीमा की आख़िरी लाइन”

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Dec 11, 2025
  • 2 min read

हिमालय की ऊँची बर्फ़ीली चोटियों के बीच बसा छोटा सा गाँव मल्ला हर साल कड़कड़ाती सर्दियों से जूझता था। लेकिन वहाँ के लोगों का हौंसला मौसम से भी ज्यादा मज़बूत था। इसी गाँव में रहता था अंशुल, जिसकी आँखों में एक ही सपना पलता था—देश की वर्दी पहनना।


अंशुल के पिता एक किसान थे, पर उन्होंने हमेशा बेटे में देशभक्ति की लौ जगाई। बचपन में वे अक्सर कहते,

“बेटा, सरहदें बर्फ से नहीं, जवानों की हिम्मत से जमी रहती हैं।”

यह बात अंशुल के दिल में पत्थर पर लिखी की तरह बस गई।


समय के साथ अंशुल बड़ा हुआ और सेना में भर्ती हो गया। उसकी ड्यूटी उत्तर भारत की उस बर्फीली सीमा पर लगी, जहाँ तापमान −20°C तक नीचे चला जाता था और हवा इतनी तेज़ कि खड़े रहना भी मुश्किल हो। लेकिन अंशुल हर दिन तिरंगे को देखकर खुद को याद दिलाता—

“यह ठंड असली है, पर देश के लिए मेरा इरादा उससे भी ज्यादा सच्चा है।”


एक रात चौकी पर हलचल हुई। भारतीय खुफिया एजेंसियों को सूचना मिली कि दुश्मन पहाड़ों के बीच बनी एक संकरी घाटी से घुसपैठ की कोशिश कर सकता है। मौसम बेहद खराब था, राशन सीमित था, और संचार व्यवस्था बार-बार टूट रही थी।


कमांडर ने तुरंत एक छोटी टुकड़ी भेजने का आदेश दिया। उस टोली का नेतृत्व अंशुल को मिला। उसने बिना एक शब्द कहे अपना बैग उठाया और चल पड़ा।


घाटी तक पहुँचने का रास्ता बेहद ख़तरनाक था—चारों तरफ अंधेरा, नीचे खाई और ऊपर बर्फ से लदे पहाड़। रास्ते में अचानक भूस्खलन हुआ और टीम का संपर्क टूट गया। अंशुल ने स्थिति को समझा। अगर टीम वापस लौटी तो दुश्मन को मौका मिल जाता। वह बोला,

“सर, मैं आगे बढ़ता हूँ। बस 10 मिनट में रोशनी का संकेत दूंगा। तभी आप आगे बढ़ना।”


बाकी जवानों ने उसे रोकने की कोशिश की, पर अंशुल का फैसला अडिग था।


वह अकेला आगे बढ़ा। तेज़ हवा उसके चेहरे पर बर्फ के नुकीले कणों की तरह चोट कर रही थी। लेकिन उसके कदम नहीं रुके। घाटी के पास पहुँचकर उसने देखा—दुश्मन सैनिक धीरे-धीरे भारतीय सीमा की ओर बढ़ रहे हैं।


अंशुल ने तुरंत ऊँची चट्टान पर चढ़कर फ्लेयर गन चलाई। लाल रोशनी आसमान में कौंधी और बर्फ पर तिरंगे की तरह चमक उठी। दुश्मन चौंक गया, और गोलीबारी शुरू हुई।


अंशुल ने पूरी बहादुरी से मुकाबला किया। उसकी टीम भी संकेत देखकर पहुँच गई और दुश्मन को पीछे हटना पड़ा। सीमा सुरक्षित रही।


जब ऑपरेशन खत्म हुआ, अंशुल घायल होकर बर्फ पर लेटा था। कमांडर ने उसके पास झुककर पूछा,

“अंशुल, तुम ठीक हो?”

अंशुल ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“सर… आख़िरी लाइन हमने नहीं दी… वो लाइन तो तिरंगा देता है।”


और फिर उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।


अगले दिन सेना ने उसके गाँव को संदेश भेजा—

“अंशुल ने अपनी जान देकर सीमा की आख़िरी लाइन को बचाया।”


मल्ला गाँव के हर घर में तिरंगा फहरा दिया गया। उसके पिता ने रोते हुए आसमान की ओर देखा और कहा,

“मेरा बेटा नहीं गया… आज पूरा देश मेरा बेटा बन गया।”



 
 
 

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