एक दिन, जब संविधान बोल उठा
- Suraj Sondhiya
- Jan 22
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सुबह की ठंडी हवा में तिरंगे की हल्की-हल्की सरसराहट थी। गाँव के स्कूल के मैदान में बच्चे कतारबद्ध खड़े थे। आज 26 जनवरी थी—गणतंत्र दिवस। हर साल की तरह इस साल भी ध्वजारोहण होना था, लेकिन इस बार कुछ अलग होने वाला था।
आठवीं कक्षा का छात्र अमन सबसे पीछे खड़ा था। उसके मन में सवालों का सैलाब था—
“आज़ादी तो 1947 में मिली थी, फिर 26 जनवरी इतना खास क्यों है?”
ध्वजारोहण के बाद प्रधानाचार्य जी ने मंच से कहा,
“आज हम सिर्फ झंडा नहीं फहरा रहे, आज हम अपने संविधान को याद कर रहे हैं।”
अमन का मन और उलझ गया। संविधान? वह तो मोटी-सी किताब होती है, जिसे बस बड़े लोग पढ़ते हैं—ऐसा वह सोचता था।
कार्यक्रम के बाद अमन स्कूल की लाइब्रेरी में चला गया। वहीं एक पुरानी अलमारी में उसे नीले रंग की मोटी किताब मिली—भारत का संविधान। जैसे ही उसने किताब खोली, मानो शब्द जीवित हो उठे।
एक आवाज़ गूंजी—
“मैं संविधान हूँ। मैं सिर्फ कानून नहीं, तुम्हारे सपनों की रक्षा हूँ।”
अमन घबरा गया, लेकिन उत्सुकता और बढ़ गई।
“क्या आप सच में सबके लिए बराबर हैं?” उसने पूछा।
संविधान मुस्कुराया,
“हाँ, मैं अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष—सबको समान अधिकार देता हूँ। लेकिन मुझे जीवित रखने के लिए तुम्हें अपने कर्तव्य निभाने होंगे।”
अमन ने पूछा,
“मेरे जैसे बच्चे क्या कर सकते हैं?”
संविधान ने उत्तर दिया,
“सच बोलो, ईमानदार बनो, दूसरों का सम्मान करो, देश को गंदा मत करो, और जब बड़ा हो जाओ—तो अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाओ।”
अचानक स्कूल की घंटी बजी। अमन की तंद्रा टूटी। वह किताब अब भी वहीं थी—शांत और स्थिर। लेकिन अमन बदल चुका था।
अगले दिन से उसने छोटे-छोटे काम शुरू किए। वह लाइन में खड़ा रहने लगा, कचरा डस्टबिन में डालने लगा, और कमजोर बच्चों की मदद करने लगा। उसे अब समझ आ गया था कि देशभक्ति सिर्फ भाषण देने में नहीं, सही आचरण में है।
अगली 26 जनवरी को जब अमन को मंच से बोलने का मौका मिला, तो उसने कहा—
“संविधान किताब में नहीं, हमारे व्यवहार में जिंदा रहना चाहिए।”
तालियों की गूंज में तिरंगा लहराया।
और अमन के दिल में एक मजबूत विश्वास जन्म ले चुका था—
जब हर नागरिक संविधान को जीने लगेगा, तभी भारत सच्चा गणराज्य बनेगा।
जय हिंद।
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