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“एक तीर, एक प्रतिज्ञा”

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Nov 20
  • 1 min read

राजस्थान की वीर भूमि मेवाड़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। उनका जीवन वैभव, सत्ता और महलों से नहीं बल्कि स्वाभिमान, संघर्ष और आत्मसम्मान से परिभाषित हुआ।


समय ऐसा आया जब पूरे भारत में मुग़ल साम्राज्य का विस्तार होता जा रहा था। कई राजघराने अपने वैभव, सिंहासन और सुरक्षा के लिए मुग़लों से समझौता कर चुके थे। सलाहकारों ने महाराणा प्रताप से भी कहा कि यदि वे भी समझौता कर लें तो महलों, धन और सुख की कोई कमी नहीं रहेगी।


लेकिन महाराणा प्रताप ने शांत स्वर में उत्तर दिया —

“जिस मिट्टी ने मुझे जन्म दिया, मैं उसे बेचना नहीं जानता।”


उन्होंने कसम खाई कि जब तक मेवाड़ स्वतंत्र न हो जाए, तब तक वह राजसी भोजन नहीं करेंगे, भूमि पर सोएंगे और पत्तलों पर भोजन करेंगे। उनकी इस प्रतिज्ञा के पीछे केवल एक ही उद्देश्य था —

“स्वतंत्रता, चाहे जितनी कठिन क्यों न हो, समझौते से प्राप्त गुलामी से बेहतर है।”


जंगलों में रहकर, घास की रोटी खाकर, युद्ध घोड़े चेतक के साथ कठिनाइयों को झेलते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी।


कई वर्ष बीत गए, परंतु उनका संकल्प कभी न डिगा। अंततः परिस्थितियाँ बदलीं और महाराणा प्रताप ने वह दिन देखा जब मेवाड़ का सम्मान फिर से स्वतंत्रता की हवा में सांस लेने लगा।


आज भी उनके संघर्ष को देखकर इतिहास कहता है —

“परिस्थिति कितनी भी कठोर हो, यदि लक्ष्य में आग और मन में आत्मसम्मान हो, तो विजय निश्चित है।”

 
 
 

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