“कभी-कभी खामोशी नहीं, हिम्मत जरूरी होती है”
- Suraj Sondhiya
- 4 days ago
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जीवन में अक्सर हमें ये सिखाया जाता है कि शांति सबसे बड़ी ताकत है। गुस्सा खराब है, बहस मत करो, चुप रहो—यही बातें बचपन से हमारे कानों में डाली जाती हैं। लेकिन हर परिस्थिति में चुप रहना सच में सही होता है क्या? यही सवाल हमारी कहानी का असली संदेश है।
यह कहानी है अरविंद की, जो एक शांत स्वभाव का, मेहनती और ईमानदार लड़का था। ऑफिस हो या घर, वह हमेशा झगड़े से दूर रहता था। अगर कोई उसकी मेहनत का श्रेय ले जाए, तब भी वह मुस्कुरा कर चुप हो जाता। अगर कोई उसका हक छीन ले, फिर भी वह “कोई बात नहीं” कहकर अपनापन निभाता रहता।
एक दिन ऑफिस में एक बड़ा प्रोजेक्ट आया। अरविंद ने दिन-रात मेहनत की, पूरी टीम को साथ लेकर चला। लेकिन जब प्रेजेंटेशन का दिन आया, तो उसके वरिष्ठ साथी ने उसका पूरा श्रेय खुद ले लिया। अरविंद वहीं बैठा रहा—चुप, शांत और मुस्कुराता हुआ।
लेकिन उस शाम वह घर पहुंचा तो दिल में एक भारीपन था।
पहली बार उसे लगा कि यह शांति उसकी कमजोरी बन रही है।
अगले दिन जब बॉस ने उसी वरिष्ठ को और बड़े प्रोजेक्ट का लीड बना दिया, तो अरविंद के अंदर कुछ टूट गया। उसने महसूस किया कि जो लोग चुप रहते हैं, उनकी मेहनत को अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है।
उस रात वह देर तक सोचता रहा।
क्या हमेशा शांत रहना ही अच्छा है?
क्या अपनी बात न कहना, खुद के साथ अन्याय नहीं है?
अगली सुबह अरविंद ने निर्णय लिया—“आज मैं चुप नहीं रहूँगा।”
ऑफिस पहुंचते ही उसने बॉस से मुलाकात मांगी। पहली बार उसने बिना डर के अपनी बात रखी। उसने बताया कि असली मेहनत किसने की थी, किसने रातों को जागकर पूरा काम संभाला था। बॉस पहले तो हैरान हुआ, क्योंकि उसने अरविंद को हमेशा शांत और बिना शिकायत वाले रूप में ही देखा था।
लेकिन जब उसने सबूत और पूरी प्रक्रिया बताई, तो बॉस को सच्चाई समझ आ गई।
उसी दिन टीम मीटिंग में बॉस ने अरविंद की मेहनत को सबके सामने सराहा और अगले बड़े प्रोजेक्ट का लीड उसे सौंप दिया।
जो लोग पहले उसे कमजोर समझते थे, अब उसके आत्मविश्वास के आगे झुक गए।
अरविंद को उस दिन एक चीज समझ आई—
हमेशा शांति चुनना गलत नहीं, लेकिन गलत के सामने चुप रहना और भी ज्यादा गलत है।
कभी-कभी आवाज उठानी पड़ती है।
कभी-कभी अपनी सीमाएँ तय करनी पड़ती हैं।
कभी-कभी मजबूत बनने के लिए शांत नहीं, साहसी होना पड़ता है।