“तिरंगे की छाया में”
- Suraj Sondhiya
- Dec 10, 2025
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राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में बसे छोटे से कस्बे सरदारपुरा का हर बच्चा रेत के टीलों में खेलते-खेलते एक ही सपना देखता—फौजी बनना। उन्हीं बच्चों में से एक था वीर, जिसकी आँखों में बचपन से ही तिरंगे की चमक बसती थी। स्कूल में जब भी राष्ट्रगान बजता, वीर सबसे ऊँची आवाज़ में गाता। उसकी माँ हँसकर कहती, “एक दिन ये बच्चा पूरा गाँव रोशन करेगा।”
समय बीतता गया और वीर का सपना और मजबूत होता गया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने सेना की भर्ती दी, पर पहली बार में चयन नहीं हुआ। आस-पास के लोग बोलते, “छोड़ दे बेटा, किस्मत सबकी नहीं होती।” लेकिन वीर हार मानने वालों में से नहीं था। उसने अपने पिता की पुरानी साइकिल निकाली, रोज़ सुबह 4 बजे अभ्यास करता, रेत में दौड़ता, पुश-अप्स करता, और खुद को बार-बार कहता—“देश के लिए कुछ करना है।”
दूसरी बार में उसका चयन हो गया। पूरे कस्बे ने उसे कंधों पर उठाकर तिरंगे के साथ जुलूस निकाला। वीर की माँ ने आँखों में आँसू लिए उसके माथे पर चंदन लगाया और बोली, “देश की रक्षा करना, पर खुद की भी।” वीर मुस्कुराया, “माँ, जहाँ तिरंगा है, वहाँ मैं भी हूँ।”
कुछ साल बाद वीर की तैनाती सीमा के एक ऐसे इलाके में थी जहाँ दुश्मन की हर हलचल खतरा बन सकती थी। एक रात अचानक इंटेलिजेंस सूचना मिली कि दुश्मन गुप्त सुरंग के रास्ते भारतीय चौकी तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। कमांडर ने टीम भेजने की तैयारी की, लेकिन समय बहुत कम था। सुरंग जंगल के बीच थी, और रास्ता इतनी संकरा कि पूरी टीम एक साथ नहीं पहुँच सकती थी।
तभी वीर आगे आया, “सर, मैं पहले जाता हूँ। रास्ता साफ करूँगा, आप तुरंत समर्थन भेज देना।”
कमांडर ने हिचकते हुए कहा, “जोखिम बहुत है, वीर।”
वीर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “सर, जोखिम तो तब है जब हम चुप बैठें। देश को हमसे उम्मीद है।”
अँधेरी रात में सिर्फ टॉर्च की हल्की रोशनी और जंगल की सिसकारियाँ उसके साथ थीं। वीर अकेला सुरंग की तरफ बढ़ा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि दुश्मन सैनिक चुपके से आगे बढ़ रहे हैं। उसने तुरंत वायरलेस पर मैसेज भेजा, लेकिन सिग्नल कमजोर था। उसने बिना देर किए पास की ऊँची चट्टान पर चढ़कर फ्लेयर गन दागी—एक लाल रोशनी आसमान में चमक उठी, जो उसकी टीम के लिए संकेत थी।
दुश्मन चौकन्ना हो गया और गोलियाँ चलने लगीं। वीर ने चट्टानों के पीछे छिपकर जवाब दिया। अकेले आदमी की ऐसी बहादुरी से दुश्मन भी संभल नहीं पा रहा था। कुछ मिनटों में भारतीय टुकड़ी पहुँच गई। सुरंग की ओर बढ़ने का प्रयास विफल हो गया और दुश्मन पीछे हट गया।
ऑपरेशन खत्म होने के बाद, जब वीर वापस चौकी लौटा, उसका हाथ घायल था, लेकिन उसकी आँखों में वही चमक थी जो बचपन में होती थी। कमांडर ने उसका हाथ दबाकर कहा, “तू अकेले खड़ा रहा, वीर।”
वीर हँसकर बोला, “सर, मैं अकेला नहीं था… मेरे साथ तिरंगे की छाया थी।”
अगले दिन सरदारपुरा में जब ये खबर पहुँची, पूरे कस्बे ने गर्व से कहा—
“वीर ने फिर साबित कर दिया… देशभक्ति खून में नहीं, दिल की धड़कनों में होती है।”
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