समय की कीमत
- Suraj Sondhiya
- Dec 21, 2025
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अजय एक छोटे से कस्बे में रहने वाला सामान्य युवक था। उसके पिता सरकारी कर्मचारी थे और माँ गृहिणी। घर में कोई कमी नहीं थी, लेकिन अजय के भीतर एक बेचैनी थी—वह जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता था। वह मानता था कि अभी बहुत समय है, सपने बाद में भी पूरे किए जा सकते हैं।
कॉलेज खत्म होने के बाद अजय ने तैयारी शुरू करने के बजाय टालना शुरू कर दिया। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों—यही उसका मंत्र बन गया। दोस्त आगे बढ़ते गए, कोई नौकरी में लग गया, कोई अपने काम में व्यस्त हो गया, लेकिन अजय वहीं खड़ा रहा। समय चुपचाप निकलता गया।
एक दिन पिता का तबादला हो गया और घर की जिम्मेदारियाँ अचानक अजय पर आ गईं। अब “कल” का विकल्प नहीं था। उसे समझ आया कि समय कभी किसी के लिए नहीं रुकता। मजबूरी में उसने एक साधारण नौकरी पकड़ ली। तनख़्वाह कम थी, काम ज्यादा, और मन पूरी तरह असंतुष्ट।
ऑफिस में अजय अक्सर एक बुजुर्ग चपरासी को देखता था, जो हमेशा समय से काम करता और शांत रहता। एक दिन अजय ने उससे पूछा, “काका, आप इतने संतुष्ट कैसे रहते हैं?”
काका मुस्कुराए और बोले, “बेटा, मैंने जिंदगी देर से समझी। अब जो समय मिला है, उसकी कदर करता हूँ।”
यह बात अजय के दिल में चुभ गई। उसे एहसास हुआ कि असली गलती हालात की नहीं, उसकी आदतों की थी। उसी दिन उसने तय किया कि चाहे हालात जैसे हों, वह अपने समय का सही उपयोग करेगा।
अजय ने सुबह जल्दी उठना शुरू किया, रोज़ कुछ नया सीखने लगा और अपने लक्ष्य के लिए एक निश्चित समय निकालने लगा। थकान होती थी, लेकिन अब वह समय को दोष नहीं देता था। धीरे-धीरे उसकी काबिलियत निखरने लगी। वरिष्ठ अधिकारी उसके काम पर ध्यान देने लगे।
एक साल के भीतर अजय को बेहतर पद मिल गया। आमदनी बढ़ी, घर की स्थिति सुधरी और आत्मसम्मान भी लौट आया। सबसे बड़ी बात यह थी कि अब अजय खुद से खुश था।
एक शाम अजय ने काका को धन्यवाद कहा। काका ने मुस्कुराकर कहा, “मैंने कुछ नहीं सिखाया बेटा, बस तुम्हें समय की कीमत दिखा दी।”
अजय ने उस दिन समझ लिया कि सपने टूटते नहीं हैं, हम उन्हें समय पर पूरा करना छोड़ देते हैं। जो इंसान समय की कदर करना सीख लेता है, उसके लिए हालात भी रास्ता बना देते हैं।
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