“वो मोमबत्ती जो बुझी नहीं”
- Suraj Sondhiya
- Nov 16
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1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय की बात है। भारत अंग्रेज़ी हुकूमत की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था। विद्रोह की चिंगारी भले ही कुछ स्थानों पर दिख रही थी, लेकिन देश के अधिकांश लोग डर के कारण आवाज़ उठाने से कतराते थे।
उसी समय झाँसी की धरती पर एक महिला योद्धा ने जन्म लिया — मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई)। बचपन से ही उनमें असाधारण साहस झलकता था। जब अन्य लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं, वह घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और युद्धकला सीखती थीं।
समय के साथ उन्हें झाँसी की रानी घोषित किया गया, लेकिन जल्द ही अंग्रेजों ने “डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स” के तहत झाँसी को हड़पने का प्रयास किया। रानी ने दृढ़ स्वर में कहा —
“मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी!”
बहुत से लोगों ने सलाह दी कि रानी सरेंडर कर दें, ताकत कम है, हथियार सीमित हैं, लेकिन रानी ने कहा —
“युद्ध का निर्णय सेना की संख्या नहीं, संकल्प की तीव्रता करती है।”
रानी ने महिलाओं, युवाओं और बुज़ुर्गों तक को संगठित कर एक जन-शक्ति बना डाली।
जब अंग्रेज़ी सेना ने हमला किया, तो झाँसी की दीवारें सिर्फ ईंटों की नहीं, हिम्मत के पत्थरों की बनी थीं। कम संसाधनों के बावजूद रानी ने ऐसा प्रतिरोध किया कि अंग्रेज़ भी उनका साहस देखकर दंग रह गए। अंतिम समय में भी उनके मुख पर केवल एक ही संदेश था —
“अगर जीवन में जीत नहीं मिल पाए, तो मृत्यु भी ऐसी होनी चाहिए कि इतिहास सिर झुकाकर सलाम करे।”
आज, चाहे हम उनका किला देखें या उनका नाम लें — एक बात स्पष्ट दिखाई देती है:
“पराजय उस व्यक्ति की नहीं होती, जो अंत तक लड़ता है; पराजय उसकी होती है, जो कोशिश किए बिना हार मान लेता है।”