“टूटा हुआ दीपक”
- Suraj Sondhiya
- Nov 25, 2025
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एक शांत गाँव में अनिरुद्ध नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन हर बार असफल होने पर खुद को ही दोष देता था।
उसे लगता था कि वह किसी काम के लायक नहीं है।
दीवाली से एक दिन पहले गाँव के मंदिर में पूजा की तैयारी हो रही थी। पुराना मुख्य दीपक टूट गया था और पुजारी नए दीपक की तलाश कर रहे थे।
मगर मंदिर में पड़े बाकी दीपक भी या तो टेढ़े थे, या थोड़ा सा टूटे हुए।
अनिरुद्ध ने पुजारी से कहा—
“बाबा, ये सब दीपक खराब हैं… इनसे क्या उजाला होगा?”
पुजारी मुस्कुराए और बोले—
“बेटा, उजाला दीपक की मिट्टी से नहीं, उसकी लौ से होता है।”
उन्होंने एक हल्का-सा टूटा दीपक उठाया, उसमें तेल और बाती डाली और जलाया।
दीपक में दरार थी, पर उसकी लौ बहुत सुंदर, स्थिर और उज्जवल थी।
पुजारी ने कहा—
“देखो अनिरुद्ध… यह दीपक टूटा है, पर फिर भी मंदिर को रोशन कर रहा है।
इंसान भी ऐसा ही होता है।
उसके भीतर चाहे कितनी भी कमियाँ हों,
अगर दिल में ‘लौ’ है—
मेहनत की, उम्मीद की, और विश्वास की—
तो वह दुनिया को रोशन कर सकता है।”
ये बातें अनिरुद्ध के मन में सीधे उतर गईं।
उसने फैसला किया कि अब वह अपनी कमियों को नहीं, बल्कि अपनी कोशिशों को देखेगा।
कुछ महीनों में वही लड़का, जो खुद पर शक करता था, गाँव का सबसे कुशल कारीगर बन गया।
लोग कहते थे—
“टूटा हुआ दीपक भी चमक सकता है, बस जलने की चाह होनी चाहिए।”
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