top of page
Search

हार मानने से एक कदम पहले

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Dec 20, 2025
  • 2 min read

रवि एक साधारण गाँव से आया हुआ लड़का था। पिता खेतों में मेहनत करते थे और माँ घरों में सिलाई। सपने बड़े थे, लेकिन हालात छोटे। रवि का सपना था कि वह एक दिन अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकालेगा और समाज में अपनी पहचान बनाएगा।


रवि जब शहर आया तो उसे लगा कि मेहनत से सब कुछ मिल जाएगा। शुरुआत में उसने एक छोटी नौकरी पकड़ी। सुबह जल्दी निकलना, देर रात लौटना—यह उसकी दिनचर्या बन गई। लेकिन कुछ ही महीनों में उसे अहसास हुआ कि सिर्फ मेहनत काफी नहीं होती, धैर्य और सही दिशा भी जरूरी होती है। नौकरी चली गई, बचत खत्म होने लगी और आत्मविश्वास भी कमजोर पड़ने लगा।


एक शाम रवि पार्क की बेंच पर बैठा हुआ था। मन में हजारों सवाल थे—“क्या मैं गलत हूँ?”, “क्या मेरे सपने ही गलत हैं?” तभी उसने पास बैठे एक बुजुर्ग को देखा, जो शांति से अखबार पढ़ रहे थे। बुजुर्ग ने रवि की उदासी भांप ली और मुस्कुराकर बोले, “बेटा, जीवन में सबसे खतरनाक पल वही होता है जब इंसान हार मानने का फैसला कर लेता है।”


रवि ने अपनी पूरी कहानी उन्हें सुना दी। बुजुर्ग ने कहा, “जब लगता है कि सब खत्म हो गया है, असल में वहीं से कुछ नया शुरू होता है। बस एक कदम और चलो—हार मानने से पहले।”


उनकी बात रवि के दिल में उतर गई। उसने तय किया कि वह खुद पर आखिरी बार विश्वास करेगा। उसने अपनी कमज़ोरियों को समझा, नई स्किल सीखनी शुरू की और रोज़ अपने लक्ष्य के लिए थोड़ा-थोड़ा काम करने लगा। इस बार उसने जल्दी सफलता की उम्मीद नहीं की, बल्कि निरंतरता को अपना हथियार बनाया।


महीने बीतते गए। रास्ता आसान नहीं था, कई बार मन डगमगाया, लेकिन रवि को बुजुर्ग के शब्द याद आते—“एक कदम और।” धीरे-धीरे उसे छोटे-छोटे मौके मिलने लगे। पहले फ्रीलांस काम, फिर एक स्थायी अवसर। आमदनी बढ़ी, आत्मविश्वास लौटा और सपनों को नई उड़ान मिली।


कुछ साल बाद रवि उसी पार्क में दोबारा गया। इस बार उसकी आँखों में निराशा नहीं, संतोष था। उसे वही बुजुर्ग फिर दिखाई दिए। रवि ने झुककर धन्यवाद कहा। बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले, “मैंने कुछ नहीं किया, बस तुम्हें हार मानने से रोका।”


रवि समझ गया कि जीवन में सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जब सब कुछ खत्म लगता है, तब भी हार मानने से पहले एक कदम और चलना चाहिए। क्योंकि कई बार जीत बस उसी एक कदम की दूरी पर होती है।



 
 
 

Recent Posts

See All
उम्मीद की सीढ़ी

रमेश एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। उसका परिवार बहुत गरीब था। पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में बर्तन माँजती थीं। रमेश पढ़ना चाहता था, लेकिन हालात हर दिन उसे पढ़ाई से दूर ले जा

 
 
 
खामोश घंटी

छोटे से कस्बे में एक पुराना स्कूल था। उसकी दीवारों पर समय की परतें जमी थीं और आँगन में लगा पीपल का पेड़ हर सुबह बच्चों की हँसी सुनता था। उसी स्कूल में पढ़ता था आरव—शांत, कम बोलने वाला, लेकिन आँखों में

 
 
 
आख़िरी दीया

रात का समय था। पूरा गाँव अँधेरे में डूबा हुआ था। बिजली कई दिनों से नहीं आई थी। केवल रामू के घर के बाहर एक छोटा-सा दीया जल रहा था। वही दीया पूरे गाँव के लिए उम्मीद की तरह चमक रहा था। रामू गाँव का साधार

 
 
 

Comments


bottom of page