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“किस्मत का दरवाज़ा”

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Nov 24, 2025
  • 1 min read

एक पुराने कस्बे में राघव नाम का एक युवक रहता था। वह मेहनती था, ईमानदार था, लेकिन उसकी एक आदत उसे पीछे खींचती थी—

वह हर काम शुरू करने से पहले ही डर जाता था।


एक दिन वह अपने पिता के साथ खेत में काम कर रहा था। दूर पहाड़ की चोटी पर एक पुरानी सी हवेली दिख रही थी। पिता ने कहा—

“राघव, उस हवेली में एक ऐसा खजाना है जो किसी की किस्मत बदल सकता है।”


राघव की आँखें चमक गईं।

“तो कोई ले क्यों नहीं जाता, पिताजी?”


पिता मुस्कुराए—

“क्योंकि… उसके दरवाज़े पर दो शेरों की मूर्तियाँ हैं। लोग डरकर लौट आते हैं।”


राघव ने सोचा,

“अगर सिर्फ डर के कारण लोग नहीं जाते, तो शायद असली खतरनाक चीज़ वहाँ हो ही नहीं।”


उस रात वह साहस जुटाकर पहाड़ पर चढ़ने लगा। चोटी पर पहुँचते ही उसने देखा—

दो बड़े पत्थर के शेर… बिल्कुल शांत।

कोई आवाज़ नहीं, कोई हरकत नहीं।


दिल जोर से धड़क रहा था, लेकिन वह आगे बढ़ा।

जैसे ही उसने दरवाज़ा धक्का दिया— कर्कश आवाज़ हुई, पर दरवाज़ा खुल गया।


अंदर कोई खजाना नहीं था। वहाँ एक पुराना लकड़ी का बोर्ड टंगा था, जिस पर लिखा था—


“खजाना दरवाज़े के अंदर नहीं…

दरवाज़ा खोलने की हिम्मत में है।”


राघव समझ गया।

जो लोग डरकर लौट गए, वे कभी जान ही नहीं पाए कि वहां कोई खतरा था ही नहीं।


वह नीचे लौटते समय खुद से बार-बार कह रहा था—

“डर सिर्फ बाहर खड़ा होता है… असली जीत अंदर इंतज़ार करती है।”


उस दिन से राघव ने हर काम हिम्मत से शुरू करना सीख लिया।

और धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदल गई।


 
 
 

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