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चुपचाप दिया गया कर्ज़

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Dec 17, 2025
  • 1 min read

गाँव बैरागढ़ छोटा था, पर वहाँ के लोग दिल के बड़े थे। उसी गाँव में रहता था मोहन, जो कस्बे के सरकारी स्कूल में चपरासी था। तनख़्वाह कम थी, पर इज़्ज़त बहुत।


हर सुबह मोहन स्कूल के गेट पर झाड़ू लगाता, बच्चों को मुस्कुराकर अंदर जाने देता और सबसे पहले तिरंगे को सलाम करता। बच्चे उसे “मोहन काका” कहते थे।


एक दिन स्कूल में खबर फैली कि प्रधानाध्यापक की बेटी की पढ़ाई रुक सकती है। शहर के कॉलेज की फीस बहुत ज़्यादा थी। बात धीरे-धीरे मोहन के कानों तक पहुँची।


उस रात मोहन देर तक जागता रहा। उसकी पत्नी ने पूछा,

“इतनी चिंता क्यों?”

मोहन ने कहा,

“अगर पढ़ी-लिखी बेटी आगे नहीं बढ़ेगी, तो देश कैसे बढ़ेगा?”


अगले दिन मोहन ने प्रधानाध्यापक के कमरे में चुपचाप एक लिफ़ाफ़ा रख दिया। उसमें उसकी पूरी जमा-पूँजी थी—जो उसने बेटे की शादी के लिए बचा रखी थी। लिफ़ाफ़े पर बस इतना लिखा था:

“इसे कर्ज़ समझिए, देश लौटा देगा।”


प्रधानाध्यापक की आँखें भर आईं। उन्होंने मोहन को बुलाया, पर मोहन ने सिर झुका दिया।

“सर, नाम मत बताइए। मदद दिखे तो अहंकार बन जाता है।”


साल बीते। वही बेटी IAS बनकर गाँव लौटी। स्कूल के मंच से उसने कहा,

“आज अगर मैं यहाँ खड़ी हूँ, तो एक अनजान मदद की वजह से।”


भीड़ में खड़े मोहन ने बस तिरंगे को देखा और मुस्कुरा दिया।

 
 
 

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