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समय की रसीद

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Dec 19, 2025
  • 1 min read

रेलवे स्टेशन के बाहर एक पुरानी सी चाय की दुकान थी। नाम था “विश्वास टी स्टॉल”। दुकान छोटी थी, पर वहाँ रुकने वालों की कहानियाँ बड़ी थीं। उस दुकान को चलाता था रमेश, जो हर ग्राहक को चाय के साथ मुस्कान भी मुफ्त देता था।


रमेश की एक आदत सबको अजीब लगती थी। वह हर दिन एक रजिस्टर में कुछ लिखता और आखिर में नीचे तारीख डालकर हस्ताक्षर करता। किसी ने पूछा तो बस हँसकर कहता,

“यह मेरी ज़िंदगी की रसीद है।”


एक दिन देर रात स्टेशन पर अफरा-तफरी मच गई। एक बूढ़ा आदमी प्लेटफॉर्म पर गिर पड़ा। लोग घबराए, कोई आगे नहीं आया। रमेश ने बिना दुकान बंद किए सोचे-समझे, उस आदमी को सहारा दिया, पानी पिलाया और अपने मोबाइल से एम्बुलेंस बुला ली।


एम्बुलेंस आने में समय लगा। रमेश उस बूढ़े के पास बैठा रहा। चाय ठंडी हो गई, ग्राहक चले गए, लेकिन रमेश हिला नहीं।


बूढ़ा आदमी होश में आया तो बोला,

“बेटा, आज तूने मेरी जान बचा ली।”

रमेश मुस्कुराया,


“नहीं बाबा, आज मैंने अपनी रसीद सही की है।”


कुछ दिन बाद स्टेशन पर एक बोर्ड लगा—

“आज से ‘विश्वास टी स्टॉल’ स्टेशन की आधिकारिक चाय दुकान होगी।”

लोग हैरान थे। पता चला, वह बूढ़ा आदमी रेलवे का सीनियर अधिकारी था।


सब रमेश को बधाई देने आए। रमेश ने उस रात रजिस्टर खोला और लिखा—

“आज समय ने मेरी ईमानदारी की रसीद काट दी।”

 
 
 

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