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“एक दिन की वर्दी”

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Dec 13, 2025
  • 2 min read

शहर के पुराने हिस्से में रहने वाला रोहन हर सुबह एक ही नज़ारा देखता था—गली के मोड़ पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का जवान, सीटी बजाता हुआ, धूप-बारिश की परवाह किए बिना अपनी ड्यूटी करता। रोहन अक्सर सोचता, “लोग बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठकर देश की सेवा करते हैं, पर असली मेहनत तो यही लोग करते हैं।”


रोहन एक साधारण क्लर्क था। न वर्दी, न तमगे, न किसी पर आदेश चलाने का अधिकार। लेकिन उसके भीतर एक इच्छा थी—कम से कम एक दिन ऐसा हो, जब वह भी किसी के लिए जिम्मेदार बने।


एक दिन ऑफिस जाते समय सड़क पर बड़ा हादसा हो गया। एक बस और ट्रक की टक्कर में यातायात पूरी तरह ठप हो गया। लोग चिल्ला रहे थे, एम्बुलेंस फँसी हुई थी, और पुलिस के पहुँचने में समय लग रहा था। उसी ट्रैफिक पुलिस जवान को रोहन ने ज़मीन पर गिरा देखा—उसे चक्कर आ गया था।


भीड़ घबरा गई। कोई आगे नहीं आया।


रोहन ने बिना सोचे-समझे जवान की सीटी उठाई, उसकी टोपी सीधी की और सड़क के बीच खड़ा हो गया। उसने ज़ोर से सीटी बजाई, हाथों से इशारे किए और ट्रैफिक को धीरे-धीरे नियंत्रित करने लगा। शुरुआत में लोग हँसे—“ये कौन है?”—लेकिन जब उन्होंने देखा कि एम्बुलेंस आगे बढ़ रही है, तो सब शांत हो गए।


करीब आधे घंटे तक रोहन धूप में खड़ा रहा। पसीना बहता रहा, पैर दर्द करने लगे, पर उसने जगह नहीं छोड़ी। तभी पुलिस की गाड़ी आ गई। जवान को अस्पताल ले जाया गया। अफ़सर ने रोहन से पूछा,

“तुम कौन हो?”

रोहन ने मुस्कुराकर कहा, “सर, आज बस… एक दिन की वर्दी पहनी थी।”


अगले दिन वही ट्रैफिक जवान वापस ड्यूटी पर आया। उसने रोहन को पहचान लिया। सीटी थमाते हुए बोला,

“भाई, कल अगर तुम न होते, तो पता नहीं क्या होता। देश ऐसे लोगों से ही चलता है।”


रोहन ऑफिस पहुँचा तो बॉस ने भी उसकी पीठ थपथपाई। लेकिन रोहन जानता था—सम्मान किसी पद से नहीं, कर्तव्य निभाने से मिलता है।


उस शाम रोहन फिर उसी मोड़ से गुज़रा। उसने वर्दी नहीं पहनी थी, पर उसकी चाल में आत्मविश्वास था। उसे एहसास हो चुका था कि देशसेवा सिर्फ सीमा पर नहीं होती—


कभी-कभी एक दिन की वर्दी भी पूरी ज़िंदगी का अर्थ सिखा देती है।

 
 
 

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