उम्मीद की सीढ़ी
- Suraj Sondhiya
- 4 days ago
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रमेश एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। उसका परिवार बहुत गरीब था। पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में बर्तन माँजती थीं। रमेश पढ़ना चाहता था, लेकिन हालात हर दिन उसे पढ़ाई से दूर ले जाने की कोशिश करते थे। कई बार स्कूल की फीस न होने के कारण उसे कक्षा से बाहर बैठना पड़ता था।
गाँव के लोग अक्सर कहते,
“गरीबी में पैदा हुआ है, ज्यादा सपने मत देख।”
ये बातें रमेश के दिल को चुभती थीं, लेकिन वह हार मानने वालों में से नहीं था। वह जानता था कि अगर उसे अपनी ज़िंदगी बदलनी है, तो मेहनत के अलावा कोई रास्ता नहीं है। दिन में स्कूल जाता और शाम को एक छोटी-सी दुकान पर काम करता। दुकान का मालिक उसे बहुत कम पैसे देता था, फिर भी रमेश ईमानदारी से काम करता।
एक दिन स्कूल में शिक्षक ने पूछा,
“तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?”
सब बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर बोले। जब रमेश की बारी आई तो वह बोला,
“सर, मैं ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ जो अपने परिवार की हालत बदल सके।”
शिक्षक उसकी बात सुनकर मुस्कराए। उन्होंने रमेश को लाइब्रेरी से किताबें लाने की अनुमति दे दी। रमेश रोज़ किताबें पढ़ता, देर रात तक पढ़ाई करता और थकान के बावजूद कभी शिकायत नहीं करता।
समय बीतता गया। दसवीं की परीक्षा आई। रमेश के पास अच्छे कपड़े नहीं थे, लेकिन हौसला मजबूत था। परीक्षा के दिन जब वह स्कूल पहुँचा तो उसके जूते टूटे हुए थे। कुछ बच्चों ने उसका मज़ाक उड़ाया, मगर रमेश चुप रहा।
जब परिणाम आया, तो पूरे गाँव में चर्चा होने लगी। रमेश ने पूरे ब्लॉक में पहला स्थान हासिल किया था। उसके माता-पिता की आँखों में आँसू थे—इस बार दुख के नहीं, खुशी के।
सरकार से उसे छात्रवृत्ति मिली। उसने आगे की पढ़ाई पूरी की और कुछ सालों बाद एक अच्छी नौकरी हासिल की। पहली तनख्वाह से उसने अपने माता-पिता के लिए नए कपड़े खरीदे और माँ के हाथ में पैसे रखते हुए बोला,
“अब आपको किसी के घर काम करने की ज़रूरत नहीं।”
आज रमेश अपने गाँव के बच्चों को मुफ्त पढ़ाता है। वह कहता है,
“मैंने गरीबी को अपनी कमजोरी नहीं, अपनी ताकत बनाया।”
यह कहानी हमें सिखाती है कि
हालात चाहे जैसे भी हों, अगर मेहनत, धैर्य और विश्वास साथ हो, तो सफलता की सीढ़ी जरूर मिलती है।
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