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“आखरी सलाम”

  • Writer: Suraj Sondhiya
    Suraj Sondhiya
  • Nov 11
  • 1 min read

एक छोटे से कस्बे में विक्रम नाम का लड़का रहता था। बचपन से ही उसे तिरंगे से बहुत लगाव था।

जब भी स्कूल में ध्वजारोहण होता, उसकी आंखों में एक अलग चमक दिखाई देती।

उसका सपना था देश की वर्दी पहनना,

सीमा पर खड़े होकर देश की रक्षा करना।

घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी।

लोग कहते थे —

“नौकरी कहाँ मिलेगी? छोड़ दे ये फौज वाला सपना।”

लेकिन विक्रम ने ठान लिया —

“मुझे ये जीवन देश के नाम करना है, बस।”

वो सुबह-सुबह दौड़ता, अभ्यास करता, मेहनत करता।

आखिरकार उसका चयन सेना में हो गया।

जिस दिन उसके घर पत्र आया, उसकी माँ की आँखों में गर्व के आँसू थे।

कई सालों तक उसने कड़क ठंड, तपती धूप और दुश्मनों की नजरों के बीच ड्यूटी दी।

कभी उसने शिकायत नहीं की।

उसके लिए देश पहले था, खुद की जान बाद में।

एक रात सीमा पर अचानक हमला हुआ।

विक्रम और उसकी टीम ने मोर्चा संभाला।

वह लड़ता रहा…

दुश्मन पीछे हट गए, पर विक्रम गोली लगने से शहीद हो गया।

अगले दिन उसके गाँव में तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर आया।

पूरा गाँव उसकी अंतिम यात्रा में शामिल हुआ।

हवा में बस एक ही आवाज थी—

“विक्रम अमर रहे!”

उसकी माँ ने अपने बेटे के माथे पर हाथ रखा और मुस्कुराकर कहा—

“मेरा बेटा आज सच में बड़ा बन गया…

उसने अपना वादा और अपना धर्म दोनों निभा दिया।”

देश भक्ति सिर्फ शब्दों से नहीं,

कर्म से साबित होती है।

कुछ लोग सिर्फ जीते हैं,

और कुछ देश के लिए जीते हैं

 
 
 

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